रविवार, 25 अप्रैल 2010

चेहरा


मेरे चेहरे का 
कोई शरीर नहीं है 
न हाथ,न पैर 
न ही पेट 
केवल चेहरा है.
अन्दर से खोखला

पूरी तरह 
संवेदनाओं से,सोच से,विचार से 
पूरी तरह खोखला.


मगर मेरा चेहरा सजग है 
उन संवेदनाओं के लिए 
जो उससे जुडी है 
उन सोच व् विचारों से 
जिनमें उसका स्वार्थ हो 
उन चिंताओं के लिए 
जिससे उसका अपना सरोकार हो.


उसे ज़रुरत नहीं पडती 
हाथों की,पैरों की,
न ही पेट की
उसे ज़रुरत है केवल चेहरे की 
चेहरे को चेहरा बनाये रखने के लिए 
इसलिए 
वह केवल एक चेहरा है 
उसका कोई शरीर नहीं.

4 टिप्‍पणियां:

  1. मगर मेरा चेहरा सजग है
    उन संवेदनाओं के लिए
    जो उससे जुडी है
    उन सोच व् विचारों से
    जिनमें उसका स्वार्थ हो
    उन चिंताओं के लिए
    जिससे उसका अपना सरोकार हो.


    सही कहा अपने अनुसार चेहरा बनाना इंसानी फितरत है

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  2. pyari kavita hairavindra bhai..badhai... aaj hi pata chala iss blog ka. aanand aa gaya. apne sare rekha chitr dete raho isamey. स्लाइडशो to chal hi raha hai. nayaa bhi dena. Mauritius ke nazare bhi pyare hai. aish hai..

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  3. करे नवीनता का आव्हान,
    नव वर्ष की नव बेला में, करें नव शब्द का निर्माण.
    नूतन वर्ष की बधाई और ढेरों शुभकामनाये ।

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