शनिवार, 12 दिसंबर 2009


मैंने खिड़कियाँ खोल दी हैं
खोल दिए सारे रौशनदानों के पट
सारा घर रौशनी से भर गया
सुवासित हो गया तुम्हारी सुगंध से
दरवाजे भी खोल देता हूँ
खिडकियों से जो दिख रहा है
जंगल ,पहाड़ ,नदियों का दृश्य
शायद आ जाएँ भीतर

मै दरवाजों-खिडकियों पर
पर्दे नहीं लटकाता
... के. रवीन्द्र

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपके अनोखे प्रकृति प्रेम की इस अभिव्‍यक्ति को हमारा सलाम

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  2. सुवासित हो गया तुम्हारी सुगंध से
    दरवाजे भी खोल देता हूँ
    खिडकियों से जो दिख रहा है
    जंगल ,पहाड़ ,नदियों का दृश्य
    शायद आ जाएँ भीतर
    ravindr aji aap prakrti ki kavita kerke jeevan ke liye jo sandesh de rehe hai vah sahaj hi sampreshit hota hai ...ap jatan nahi kerte kuch kehne kaa sab sahaj v kavyatmakta se keh deta hai yeh aap ki shaktim aapki kavitaon ko bahut hi sunder v alag kerti hai ....acha laga aapko padhna ..dhanyawad

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