रविवार, 20 दिसंबर 2009

“तितली”

मेरे हाथों से छूट कर
दूर उड़ गयी थी वह तितली
मगर अब तक
उसके पंखों के नीले,सुनहरे काले रंग
मेरी उँगलियों में चिपके हुए हैं

मै रोज ताकता हूँ उन्हें
और उस बागीचे को
यादों में ढूढता रहता हूँ
जहाँ मैंने उसे पकड़ा था
चुपके से
रातरानी की झाड़ी के पास
लुकाछिपी खेलते हुए

तब मै पूरा का पूरा
मीठी खुशबू से भर गया था
लिसलिसा सा गया था मै
मेरी उँगलियाँ भी

उसके पंखों का रंग लिए
आज भी कभी-कभी
लिसलिसा जाता हूँ मै
खुशबू से भर जाता हूँ मै
आज भी

शनिवार, 19 दिसंबर 2009




















जहरीली होती जा रही है
आस्थाएँ
टूटते जा रहे हैं
सपनों के बंध

संगीनों के साये में
सायं -सायं करता जंगल

गाँव की सरहदें
सिमट कर रह गयी हैं
दरवाजों तक
घर का कोना-कोना
तरस रहा है
उजाले का एक टुकडा
बस्
छू भर लेने के लिए

नष्ट-भ्रष्ट
आदम विचारों की बंदूकें
भावनाओं के काँधे से
दागती हैं गोलियां

धुप में झुलसीं
सिसकती-हांफती हवाएं
अवसादों से सराबोर
साल वृक्ष
दे नहीं पाते छावं का एक टुकडा

सारा जंगल
बस्
सायं-सायं
भायं-भायं
ठायं-ठायं

बस्
बहुत हुआ
रौशन कर दो झरोखों को
शायद
पगडंडी नजर आने लगे
--के.रवींद्र

सब कुछ वैसा का वैसा

मेरे घर में सब कुछ सहेजा हुआ है अब तक
खिडकियों में तुम्हारी शक्ल
दरवाज़ों पर पांव
आँगन में खिलखिलाहट
कमरों में तुम्हारी गंध
बिस्तरों पर तुम्हारी छुअन

अब तक चिपकी हुई है
दीवारों पर तुम्हारी मुस्कुराहट
सब कुछ वैसा का वैसा

आले में हिदायतें
आलमारियों में ढेर सारी यादें
करीने से जमी हुई हैं
कैलेण्डर पर बीते दिनों का हिसाब
सबकुछ वैसा का वैसा

पर हाँ कहीं तस्वीर नहीं हैं

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

कानून और व्यवस्था




एक दिन
मैनें बारिश की
गुमसुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई
कानूनी रोजनामचे में
दुसरे दिन सुबह
मेरा घर बाढ़ में बह गया
मैंने ललकारा
गाँव में फ़ैली खामोशी को
छलनी कर दिया गया मेरा पूरा जिस्म
गोलियों से

यह कानून की व्यवस्था
या व्यवस्था का कानून है
मै नहीं समझ पाया
कानून और व्यवस्था

मगर तय है
जिसकी जड़े मजबूत हैं
बाढ़ भी नहीं बहा सकती उन्हें
जो छातियाँ पहले से छलनी हों
उन्हें और छलनी नहीं किया जा सकता

और
हाँ और
खामोशियों की भी जुबान होती है
कान होते हैं ,नाक होती है
होते हैं हाथ पैर

एक दिन
हाँ, किसी एक दिन
जब खडी हो जायेंगी खामोशियाँ
चीखती हुई
उठाये हुए हाथ
तब
और तब
छलनी होगी कानून की छाती
बह जायेगी खामोशी की बाढ़ में
सारी व्यवस्था
एक दिन

शनिवार, 12 दिसंबर 2009


मैंने खिड़कियाँ खोल दी हैं
खोल दिए सारे रौशनदानों के पट
सारा घर रौशनी से भर गया
सुवासित हो गया तुम्हारी सुगंध से
दरवाजे भी खोल देता हूँ
खिडकियों से जो दिख रहा है
जंगल ,पहाड़ ,नदियों का दृश्य
शायद आ जाएँ भीतर

मै दरवाजों-खिडकियों पर
पर्दे नहीं लटकाता
... के. रवीन्द्र

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

चाह कर भी जब हम
जी नहीं पाते सोचा हुआ क्षण
बीता हुआ लगने लगता है
मीठा /
भविष्य ?
भविष्य की कल्पना में
टपकने लगती है लार /
फिर भविष्य
जब हो जाता है वर्तमान
घृणा होने लगती है
अपनी बीबी,बच्चों ,परिवार से /
घर का कोना-कोना भर जाता है
वितृष्णा से /
रोम-रोम से फूटने लगते हैं
मवाद भरे फोड़े /
हम तब भी जी लेते हैं
एक एस एम एस ,टेलीफोन काल
या एक पत्र की प्रतीक्षा में ,
जो कभी नहीं आते /
क्यों लोग भूल जाते हैं
अपना भाई, अपनी बहन
माँ -बाप,बीबी-बच्चे /
,,,,,,,,,,,,,,,
चाह कर भी तब हम
जी नहीं पाते

पहाड़

जीवन में सब कुछ पा लेना
संभव नहीं है
हम जानते है
सब कुछ खो जाना भी संभव नहीं /
फिर भी कुछ पा लेने की चाह में
सब कुछ खो देते हैं /
पूरा जीवन ही
पा लेने की चाह में ,
बिखर जाता है /
छोटी-छोटी पहाड़ियों ,टेकरियों की तरह
दूर-दूर तक ,
जो चाह कर भी
सब एक पहाड़ नहीं बन सकतीं /
पहाड़
जो आकाश समेट कर
ढेर सारी खुशियाँ ;सौगातें
बिखेर देता है धरती पर /
.................
हम पहाड़ नहीं हो सकते ?

शनिवार, 14 नवंबर 2009

गाँव












चाहकर भी नहीं
लाँघ पाया देहरी, चौखट तो दूर /
कब बैठेगा कौवा मुंडेर पर,
किसी के आने का देता सन्देश /
बिसर गया,
गोबर,मिट्टी की गंध /
बह गयी आंगन की सारी मिट्टी,
कब आएगा कोई,
कि फिर लीपा जाए आँगन /

एक बार फिर सोचा
चलो "घोर-घोर रानी इत्ता-इत्ता पानी"खेलते
खो जाएँ
उन्ही धान के खेतों के बीच बहती
सूखी "मुरई धोवा"नदी [एक पहाड़ी नदी] के रेत में/
पोर-पोर में गठिये का दर्द लिए,
या फिर
पुराने जंग खाए रोड रोलर के ऊपर
जा बैठूं ,
आँखों में मोतियाबिंद की झिल्ली ओढे
खिड़की को ताकते,घंटो /
मगर सूखे पत्तों की तरह उड़कर
सारी इच्छाएं
बिखर जाती है इधर-उधर
खड़खडाती /


कैसी यह धरती,कैसा आकाश ,
इंच -इंच में बदलता इसका स्वरूप /
कहीं बूढी तो कहीं किशोर /
क्यों नहीं होती इच्छाएं बूढी ?

क्यों नहीं मानता मन
जो दिखाती है आँखें /
वह अब भी देखना चाहता है ,
वही,
झरबेरी के लाल-लाल फल ,
चने के खेत,
महूआरी सुबह का सूरज,
रम्भाती गायों के बीच उडती
गौधूली की धूल /
--के.रवींद्र



















जहरीली होती जा रही है
आस्थाएँ
टूटते जा रहे हैं
सपनों के बंध

संगीनों के साये में
सायं -सायं करता जंगल

गाँव की सरहदें
सिमट कर रह गयी हैं
दरवाजों तक
घर का कोना-कोना
तरस रहा है
उजाले का एक टुकडा
बस्
छू भर लेने के लिए

नष्ट-भ्रष्ट
आदम विचारों की बंदूकें
भावनाओं के काँधे से
दागती हैं गोलियां

धुप में झुलसीं
सिसकती-हांफती हवाएं
अवसादों से सराबोर
साल वृक्ष
दे नहीं पाते छावं का एक टुकडा

सारा जंगल
बस्
सायं-सायं
भायं-भायं
ठायं-ठायं

बस्
बहुत हुआ
रौशन कर दो झरोखों को
शायद
पगडंडी नजर आने लगे
--के.रवींद्र

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009




















आज शाम
फ़िर कुछ अनमनी सी हो गयी है |
गली में, खिड़कियों पर
उजाले अभी थिरके नहीं है
मुंडेर से उड़ा परिंदा
वापस नहीं लौटा है
सन्नाटा पसर गया है
चौराहे पर|
पडोसी
जश्न की तैयारियों में
व्यस्त है|
यह ख़बर कोई नई नहीं है
गली में
एक नितांत बूढी औरत
खिलखिला कर हंस रही है
शायद उसने देख ली है
मर्दानगी
मुहल्ले की |
अँधेरा ओढ़ कर
एक कोने
सो गया है गली का कुत्ता |
आज शाम
फ़िर कुछ अनमनी सी हो गयी है|
----के.रवीन्द्र

रविवार, 8 नवंबर 2009


मैंने तुम्हे कई बार देखा था
बौराए आम के वृक्ष के नीचे
गिलहरियो की तरह फुदकते /
शायद इसी उम्मीद में की
शीघ्र अमियाँ लगेंगी /
मैंने तुम्हे सूंघा था कई बार /
मुरईधोवा [एक पहाडी नदी ] के रास्ते में
जब जाते हुए ।
महका जाते थे राई के फूलों की महक से
रास्ते की हवाओं को /
सुना है तुमने सारी मर्यादायों को ताक पर रख दिया था /
तुम्हारे लिए मर्यादाएं ,
शायद इसीलिए थीं /
तब
मै भी भ्रम पाले हुआ था /
नहीं ,
ढेर सारे भ्रमो को /
भ्रमो को पालना नपुंसकता हो सकती है ,
फ़िर भी मैंने पाला /
आज मोतियाबिंद वाली आंखों से देखता हूँ
आम के नीचे भी,
यह जानते हुए कि
शुन्य के अलावा
कुछ भी तो नहीं है शेष /
फ़िर भी मुझे सब कुछ दीखता है /
उसी तरह ,
सब कुछ सूंघता हूँ अब भी /
गिलहरी सा फुदकना ।
हवाओं में राई के फूलों की महक /
सब कुछ उसी तरह ,
सब कुछ वैसा ही /
जब की सब कुछ बदल गया है
फ़िर भी केवल ,
मेरा भ्रम पालना नहीं बदला/
शायद ,
भ्रम को पालने का भ्रम ही जीवन हो /
जो जिया तो जाता है ,
संबंधो को नाम देकर ,
ओढे हुए
एक खूबसूरत लबादे की तरह ,
जो भीतर से तार-तार हो चुका हो /
आज ,
सैकड़ो किस्म के फूलों से सजा है ,
मेरा बागीचा/
मगर वे दे नहीं सकते
सारे के सारे फूल मिलकर भी ,
राई के फूलों की महक ,
जो मन को बांधती थी /
शायद उम्र फ़िर से लौटे
और आदमी को जिए
--के .रवीन्द्र

सोमवार, 19 अक्टूबर 2009

एक चिडिया ,

बटोर रही तिनके ।

रचेगी कहीं ,

किसी पेड़ पर

एक घरोंदा ,

फ़िर होंगे चूँ ...चूँ ...करते बच्चे ।

........ .........

चिडिया :

पेड़ कहाँ हैं ?

--के रवीन्द्र
एक चिड़िया

छोटी सी

थकी हरी

भूखी और प्यासी भी

चिंतित,

ढूंढ रही है

छाव का एक टुकडा

पहले

उसकी इन सारी चिन्ताओ की,

जिम्मेदारी उठाता था जंगल

..... ...... ......,

चिड़िया:

कहाँ है जंगल

--के रवीन्द्र

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

झरोखों से झांकते
थके हारे चेहरे
उल्लास का कफन ओढे
सड़कों पर डोलते लोग
गलियों और कूचों में
उजाले के सामने
चीटियों की तरह बुजबुजाते हुए लोग
पस्त हौसलों से
दूसरों की करते हौसलाफजाई,
कहाँ जा रहे हैं ?
शायद प्रगति चक्र है
लौट रहे हैं लोग
फ़िर बर्बर पशुता की ओर,
एक पांव आगे
फ़िर पीछे का पांव आगे
आगे का पांव पीछे
;
यही तो क्रम है /
--के रवीन्द्र
मेरी छाती पर फैल गया है
मरुस्थल
कानो में गर्म सीसे सा उतर गया है
शहरों का शोर,
काश कोई आता
रख देता सीने पर
जंगल का एक टुकडा
कानों में नदियों के कलकल का फाहा /
पोर-पोर के जाम हो गए हैं
बेरिंग्स
रख देता कोई स्नेह का मलहम /
जीने के लिए तो जी रहे हैं
किसी तरह
नपुंसक होकर,
दावों का भात पकेगा,
लगता नहीं /
राजनैतिक शराब का नशा
बढ़ रहा है दिनों- दिन
काश कोई आता
डुबो देता इस पोत को /
-- के रवीन्द्र

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

कला दीर्घा से

जिस तरह हमारा परिवेश और उससे उपजी अनुभूतियाँ बहुरंगी है, उसी तरह अभिव्यक्ति की तड़प तरंग दैध्र्यो पर सुनी जा सकती है, जिन्होंने तुलिका को अभिव्यक्ति का साधन चुना है वे इस सच्चाई से बार -बार रूबरू होते रहते है की 'ऑब्जेक्ट' से अधिक 'रिफ्लेक्ट ' का महत्व है |जिन कलाकारों को अपनी कला के जरिये साधारण चीजों के असाधारण पहलू उद् घाटित करने में सफलता हासिल हो पाती है , उन्ही में से एक है कुँअर रवीन्द्र |

ग्रामीण परिवेश से शहरी उलझाव तक की दुर्गम यात्रा पार करके मनुष्यता के सच तक पहुँचने की लालसा रखने वाला यह फनकार चित्रकला के प्रायः सभी पहलुओं को स्पर्श कर चुका है | आजादी के बाद सिर्फ पैदा हो कर, बल्कि पल -बढ़ कर संस्कार पाई हुई पीढी का कुँअर रवीन्द्र सटीक प्रतिनिधित्व करते है, जिसने वर्तमान और अतीत को श्वास और निश्वास की तरह अपनी कला में साधने की कोशिश की है |

अमूर्त की ओर विशिष्ट आग्रह रखने वाला उभर कर बिखरता हुआ यह कलाकार उसी इन्हेरेंटकन्ट्राडिक्शन का शिकार है जो प्रकारान्तर से पूरे समाज को मथ रहा है | इसी अर्थ में रवीन्द्र की कला समकालीन प्रवित्तियो और सोच को ईमानदारी से प्रतिविम्बित करती है | रवीन्द्र के पेस्टल रंग वर्णनीय विषय के माकूल है | जैसे कर्मरत ग्रामीण दम्पत्ति को चित्रित करते हुए ,उन्होंने चटक रंगों के प्रति ग्रामीण रुझान को स्पस्ट किया है| शायद यही वजह है की अमूर्त होते हुए भी उनका चित्रांकन बोलता हुआ-सा लगता है | रवीन्द्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी सुपुष्ट रेखाए है , जो किसी मेहनती किसान या मजदूर की 'मसल्स ' की तरह अपनी कहानी खुद कहती है | भावनाओ के उद्वेग और अनभूतियो के उद् दाम प्रवाह का गहराई सेचित्रण करती हुई कुँअर रवीन्द्र की रेखाए आने वाले दशकों में अभिव्यक्ति के चमत्कारों का आश्वासन जरूर देती है , बशर्ते उनकी साधना निष्कम्प और अनवरत रूप से जरी रहे |

अशोक चतुर्वेदी
कथाकार


कुँअर रवीन्द्र में इर्द -गिर्द की चीजों और उनके अन्तर्सम्बन्धों में गहरे पैठने की प्रवृत्ति परिलक्षित होती हैकृत्रिमता से परहेज बरतने वाले कुँअर की रूचि जीवंत यथार्थ में है और वह इसी यथार्थ को श्वेत -श्याम रेखाओं में उकेरने का जतन अत्यन्त तन्मयता और लगन से करते हैउनके कई रेखांकन तो शौक है और नही आदतरेखांकन उनके लिए मानसिक विक्षोभों की सहज अभिव्यक्ति है और इनकी अभिव्यक्ति का दायरा उतना ही बडा सघन है , जितना आसपास की लौकिक घटनायों का प्रभाव लोक

कुँअर रवीन्द्र अमूर्त चित्रों के चितेरे हैवह पूछते है :-आख़िर हम फाइन पेंटिंग क्यों करें ? उनका तर्क है की यह काम तो आधुनिक युग में कैमरा बखूबी कर सकता है ,और फ़िर औरत या पुरूष के शारीरिक सौन्दर्य का कला में क्या मूल्य हैकुँअर इस सोच ,विचार और कल्पना को चित्रित व्यक्त करना चाहते है ,जो कैमरे की मशीनी आँख से छूट जाती है या कैमरा जिसे पकड़ नहीं पता

कुँअर को अभी एक लम्बी और सार्थक यात्रा तय करनी हैकला यात्रा की खूबी यह होती है की यह यात्रा कभी ख़त्म नहीं होतीहर पड़ाव उपलब्धी आगे की यात्रा का बायस होते है

सुधीर सक्सेना
कवि ,पत्रकार

बुधवार, 30 सितंबर 2009

दो समानांतर यात्राएं

बहुत सरल है इस प्रश्न का उत्तर की कला क्या है ? मनुष्य की भावनाओ की अभिव्यक्ति का नाम कला है \ मनुष्य की प्रसन्नता ,उसका शोक ,उसकी करुणा ,उसका आक्रोश उसका प्रेम- वैराग्य वे तमाम सम्भावनाये चाहे जिस भी माध्यम से व्यक्त हो ,कला कह सकते है हम उसे \ जब वह तूलिका व् रंगों के माध्यम से व्यक्त हो तो वह चित्रकला बन जाती है \ जब वह छैनी- हथौडी लेकर पत्थर को तराशने लगे तो वह मूर्तिकला बन जाती है \ जब मनुष्य का शरीर स्वरताल में बिखरने लगे तो वह नृत्य बन जाता है \ जब वह शब्दों के सस्वर पाठ में मुखरित होने लगे तो वह संगीत बन जाता है \ यो कला के रूप भिन्न-भिन्न होने लगे है परन्तु उसकी आत्मा का मूल स्वर एक ही होता है , मनुष्य के भावों की अभिव्यक्ति \ इस अभिव्यक्ति के लिए सर्जक जो भी माध्यम तलाशता है वह एक अर्थ में भौतिकता से आध्यात्मिकता की यात्रा का ही पर्याय है \ कला के इन मायनों में अगर कुंवर रवीन्द्र (के. रवीन्द्र) के कृतित्व की पड़ताल करें तो भी एक मोटी बात तो प्रथम दृष्टया समझ आती है की अपने स्वरुप में प्रतीकात्मक रहते हुए रवीन्द्र ने कविता हो या रेखांकन ,केंद्र में मनुष्य की भावनिष्ठ अन्भूतियो की बहुरंगी दुनिया को ही रचा है \

मुझ जैसे बहुत से पाठक रहे होंगे जिनका भ्रम कवि और रेखांकनकार - चित्रकार को अलग -अलग स्तर पर पहचानने को लेकर रहा हो \ पर यह सच है की अभिव्यक्ति के दोनों ही माध्यमो में रवीन्द्र की रचनात्मक साधना का बहुत परिष्कृत ,परिपक्व और आत्मीय रूप प्राप्त होता है \ रवीन्द्र रेखांकन गढ़ते हुए भी किसी कविता को रचते होंगे और कविता को शब्द-शब्द पिरोते हुए भी वे एक रेखांकन से गुजरते होंगे ,यानी दो समानांतर यात्राओ के अनुभव को हम रवीन्द्र की कला कह सकते है \ यह तथ्य रवीन्द्र के रेखांकनों और कविताओ को आमने- सामने रख कर भली तरह परखा जा सकता है \ मनुष्य की दी हुई दुनिया के यथार्थ और विसंगतियों- विद्रूपों से उपजती रिएक्शन को रवीन्द्र शायद बासी होना नहीं देना चाहते \ संवेदना की उस तीव्रता को वे कविता या रेखाओ में तुरत -फुरत कैद कर लेने में कोई चूक नहीं करते होंगे \अनुशासन चाहे रेखाओ का हो या कविता का उसमें अंतर्निहित भाव-छंद संवेदनायो को समृध्य ,अनुभव क्षेत्र को गहरा, तथा सोच के क्षितिज को विस्तृत बनता है \ अपनी कला -रचना नें वे स्वयं जितने रसिक होते होंगे, पाठक -दर्शक भी कमोबेश उसी रसानुभूति से रूबरू होते होंगे \ रवीन्द्र के पास इस रचाव के लिए कोई शास्त्र होगा ,या कोई निश्चित मानक अथवा उपकरण होंगें ऐसा मानना गलती होगी \ शायद रवीन्द्र कला की अंतरनिर्भरता से गुजरते अपने इजहार को सामर्थ्य भर ये दो रूप देते होंगे \ कभी शब्दों के बिना ,रेखाओ की गतियों में ये संवेग संस्कार पाते है तो कभी शब्दों की ओर से कविता की शक्ल में आकर इन्हे राहत मिलती है \ सच तो यह है की दोनों ही स्थितियों में हमारा मन एक संप्रेषण से भर उठता है जो हमें भरपूर आश्वस्त करता है, संतुष्ट करता है \ कह सकते है की रेखांकन और कविता दोनों में रवीन्द्र की भावुकता का वजन समान और हमारे लिए समरस होने की त्रुष्टि से भरपूर है\

रवीन्द्र की कला और कविता को गति और जीवन से भरपूर एक प्रवाह कहें तो अत्युक्ति नहीं\ वे रेखाओ में जहाँ एक ओर प्रकृति और मनुष्य को जोड़ने की प्रक्रिया में आये अंग -प्रत्यंग,विक्षेप ,भंगिमा ,मोड़ तथा वक्र किसी किसी गूढ़ प्रतीकों की भाव की अभिव्यन्जना करते है तो दूसरी ओर कविता में शब्दों के इस्तेमाल करने का कौशल पाठक की मनुष्य की दुनिया के गहवर में डूबने- उतराने का सहारा बनता है \ रवीन्द्र अपनी कला में मानवीय जीवन के सच की पड़ताल करने को बेचैन नजर आते है \ बिम्बों के जरिये समझाने की हर - संभव कोशिश करते है \ यह छटपटाहट रवीन्द्र की 'आदमी' शीर्षक कविता से साफ नजर आती है --

“आजकल मैं /
एक ही बिम्ब में /
सब कुछ देखता हूँ /
एक ही बिम्ब में ऊंट और पहाड़ को /
समुद्र और तालाब को /
मगर आदमी /
मेरे बिम्बों से बाहर छिटक जाता है /
पता नहीं क्यों /
आदमी बिम्ब में समा नहीं पता है ?”


क्या रवीन्द्र की 'शहर ' कविता का टुकडा आपके मन में एक रेखांकन ,एक चित्र गढ़ता नहीं चलता -–

"इस शहर में /
एक घर /
जहाँ मै ठहर गया हूँ /
रहस्य में लिपटा सा /
फिर भी पहचाना सा /
और घर में /
एक छज्जा /
छज्जे पर मै /
सामने एक घर,फिर दो घर,ढेर सारे घर /
घर /
घर /
घर पर घर /
पतझर में बिखरे पत्तो की तरह /"


प्रतीकों का कितना सटीक इस्तेमाल की एक नजर में कविता आँखों से होकर मन तक पहुंचती है --

"कितने खूब सूरत लगते है हम /
एक कैलेण्डर की तरह /
जड़े हुए दीवार से /
या फिर कुत्ते की तरह /
अपनी दुम खुजलाने के प्रयास में /
गोल -गोल /
बस एक ही दायरे में घुमते हुए /"


दरअसल अपनी रचना में रवीन्द्र भारतीय जीवन मूल्यों की पुरजोर वकालत करते है \ वे षड्यंत्रों पर ,आक्रमणों पर अभिव्यक्ति भर प्रहार करते है \उन प्रवृतियों पर उनकी रेखाओ का वलय साक्षात् होता है जिनके वर्चस्व में ईमानदार हाशिये पर चला गया है \अपने जीते - जी बदल गयी दुनिया के सच को रवीन्द्र के चित्र और कविता बखूबी बयाँ करते है \ माँ -पिता ,बहन, दोस्त ,फूल बागीचे, नदी , किनारा ,रिश्ते -नाते ,महल झोपडी , संसद , रवीन्द्र के सोच में आते है \ कभी इस सोच के रवीन्द्र रेखांकन गढ़ते है , कभी हम उन्हें कविता में पढ़ते है \ रवीन्द्र की तूलिका और कलम का गीलापन शाश्वत रहे - यह कामना है \

--विनय उपाध्याय
कला समीक्षक ,कवि
संपादक -कला समय भोपाल














रवीन्द्र के चित्रों की सांकेतिकता प्रशंसनीय अनूठी है|
-आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी, उज्जैन
समीक्षक










रवीन्द्र की इन रेखाओं में इस युग का यथार्थ अपनी संपूर्ण चेतना के साथ विद्यमान है | गजब का संतुलन और अन्तः संगीत वाह !
-कैलाश मंण्डलेकर
व्यंगकार

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

रेखाएं बोलती हैं

के. रवीन्द्र के रेखांकनों में मानवीय संवेदनाएं बात करती सुनाई देती हैं | रेखाओं के क्षितिज -पर से जीवन कीआकृतियाँ झांकती हैं | आकृतियाँ मनुष्य की हैं | प्रकृति की हैं | प्रकृति के भीतर जड़-चेतन की समेट इनमे है| जीवन अपनी सीमाओं में असीम उदभावनाएं लिए इतिहास पथ निर्मित करता चलता है | इतिहास के मायने यहाँअपने समय के मनुष्य की हार- जीत की स्तितियों से है | इन चित्रों में आदमी मौन दिखाई देता है, लेकिन वहसमय की भाषा बोल रहा है | दूसरे शब्दों में इन आकृतियों ने आदमी के मौनमय संघर्ष को काल के स्तर पर वाणीदी है | ये रेखा- आकार अपने भीतर बहुत कुछ छिपाए हुए सब कुछ सच -सच उजागर करते हैं | काल कीनिरन्तरता के तट पर विश्राम -घाट बनाते हैं, जहाँ बैठकर कुछ विचारणीय उपजता है | विचार और रेखाएंकहीं-कहीं एकमेव हो जाती हैं | जीवन-जगत प्रतिबिंबित हो उठता है | हम अपना ही चेहरा सामने पाने लगते हैंअपना ही हास हमें गुदगुदाता है | अपने ही आसुओं का खारापन और गर्माहट हमें और आगे बढ़ने की आद्रता देते हैंतब ये रेखांकन पुतरिया नही लगते | हम अपना ही वजूद इनमे तलाशने - पाने लगते हैं |

तुलसी कहते है -'सून्य भीती पर रंग चित्र नहीं ,तनु बिनु लिखा चितेरे ,यह बात दार्शनिक होते हुए भी ,इसमेवर्तमान चित्रकला के सूत्र आकार लेते दिखाई देते है अमूर्त कला की शाब्दिक व्याख्या की ध्वन्यात्मकता इस पदसे सुनी जा सकती है रवीन्द्र ने अपने रेखांकनों में अमूर्त का टंटा खडा करके उसके ध्वनि संसार को पाने कीकोशिश की है जिसे कहा जा सकता है कि रेखाए बोलती है रेखाए मनुष्य के कर्म को रेखांकित करती है उसके कर्मसे निपजे ललित को प्रसार देती है उसके सौन्दर्य को नदी किनारे के छतनार पेड़ की फुनगी पर बैठाती है ये रेखाएमनुष्य की जिजीविषा को चिडिया की परवाज देती है एक निस्सीम आकाश छोटी सी चिडिया नाजुक से पावंकोमल सर पंख ,और धरती की गोलाई तथा आकाश की गहरी नापने की अदम्य ,अथक अनवरत उडान रेखाएकागज पर खींची लकीरे मात्र रहकर चैतन्य बन जाती है कोई हंसता, बोलता, गाता, रोता, दौड़ता झाई मारनेलगता है कला की दुनिया में दस्तक सुनाई देने लगती है

रवीन्द्र के चित्र हल्लाबोल की तर्ज पर धमाल नही मचाते |हंगामा खडा नहीं करते |मशाल नहीं थामते| बल्किशालीनता से रेखाओ की भाषा में आदमी का सुख दुःख कहते है |ये जीवन के दर्द को रेखाओ में प्रवाहित कर उसेताकत में तब्दील करते है |दर्द को उकेरने मात्र से समस्या का हल नहीं है ,हल इसमें है की दर्द पर आदमी अपनीविजय हासिल कर ले या दर्द देने वाले का मस्तक कुचल दे |ये रेखांकन दर्द पर विजय हासिल करने वाले रेखाशिखर है |इस प्रक्रिया में रवीन्द्र को रेखाओ की भीड़ नहीं जुटानी पडती |रेखाओ और नर-मुंडो का जंगल नहीं खडाकरना पड़ता |एक ठूठ और उस पर बैठी चिडिया का चित्र इसके लिए वे पर्याप्त समझते है | विभीषिका के बीच मेंजीवन के बचाव का रेखांकन उनके पास अँधेरे में हथेली पर रखे दीपक की तरह सुरक्षित है |उनके ऐसे चित्रों मेंगरमी की धू-धू जलती शाम की बखत दूर पहाडियों पर बजती बांसुरी सुनाई देती है |यह बांसुरी सुख की नहीं हैव्यक्ति की टूटी आस्था और बिखरी क्षमता को अगोरने का स्वर है |व्यक्ति की जूझ और उसमे जीवन की अनटूटीलय दोनों समानांतर रेखांकित होती है|

मनुष्य का संघर्ष और सौंदर्य इन चित्रों में कहीं-कहीं एक साथ उभरा है |पत्थरों के ढेर पर जमती जडें और पूरे कदमें खडा पेड़ तथा पेड़ को छूने और बचाने की हुलस लिए बढ़ता हाथ इस सौंदर्य उर्जा और संघर्ष क्षमता को आँख देतेहै |दूसरी और दुसरे का हाथ भी ही जो पत्थरों के ढेर को बड़ा कर रहा है |पत्थर जमा रहा है|पत्थरों के बीच धंसतीजड़े और आकाश की हथेली पर कोंपल तथा फूलों के रंग भरने वाले वृक्ष की कुहक को मौसम देने वाला यहचित्रकार है |खिड़की का खुला होना,उस पर टिका हाथ और हाथ पर टिका सिर मनुष्य की स्वतंत्रता और विवशताकी अनथक कहानी बांचता है |रवीन्द्र मजबूर करते है नियति और कर्म के बीच खड़े आदमी की स्थिती पर सोचनेतथा उससे उबारने के सन्दर्भ में |रवीन्द्र चित्र में संकेत देते है की जड़ विहीन व्यक्ति भविष्य का उजड़ा पथ हीनिर्मित करेगा |यहाँ तक की जड़ रहते हुए भी तने से पेड़ को काटना और आदमी को उसकी प्रकृति में जिन्दा देखनाचाहता है |मनुष्य को पानी डालने सरीखा है |यह उवा चित्रकार मनुष्य को उसकी प्रकृति में जिन्दा देखना चाहता हैमनुष्य को मनुष्यता सहित पाना चाहता है |पांवो पर रखे शिथिल हाथ ,गठरी बना शरीर और कंधे पर जीवन कीआशा- आकांक्षाओ तथा कर्म से रस -रस उडान के लिए आतुर बैठी चिडिया का चित्र रात के गर्भ में दूर कहीं भोरको आमंत्रण देता है |

रवीन्द्र चौकस है ,धरती के बचाव के प्रति | वह चिंतित है,बिगड़ते पर्यावरण के सम्बन्ध में |उनके चित्र के पास एकहरी टहनी है |आकाश में उडती चिडिया है ,और दूर तक आकाश की नीलिमा को भेदती दृष्टी है | आदमी और प्रकृतिके प्रति बेखबर होती प्रवित्ति के विरोध में वे हम सबको खबरदार करते है | ओद्योगिक और व्यवसाय युग में जीवितसांसों को शुद्ध हवा के लाले पड़ रहे है मशीनों के बीच दबती सुबक और दुखती छाती की कहानी को चित्रकार आकरदेता है यहाँ उसकी रेखाए शब्दों के अर्थो से अधिक गहरे और व्यापक अर्थ धारण कर जमाने के सामने आती हैनारी की कहानी और उसकी सामाजिक स्थिति रवीन्द्र से छुपी नहीं है |नारी का उपयोग उनका चित्रकार मनुष्यकी पशुता को तथा उसकी आदिम भूख को उजागर करने के लिए नहीं करता है , बल्कि नारी को उसके सम्पूर्णसामाजिक महत्त्व और दाय के साथ महिमा मंडित करता है |नारी के विवशता के अनेक चित्रों में रेखाए पाई जातीहै |लेकिन इनमे कहीं भी मांसलता है और ही व्यावसायिकता |यह चित्रकार की कूची की पवित्र झिरप का धोतक है |

रवीन्द्र के चित्र कहीं-कहीं एक ही अनटूटी रेखा में आकार ले लेते है | कहीं-कहीं रेखाओ के अन्त्गुरम्फ्न आकृतिबनाते है | बीच-बीच में स्याही का भराव भी पुष्टता और पृष्ठभूमि के ठोसपन के लिए कर लेते है |चित्र में मनुष्य कोया अपेक्षित वस्तु को रेखांकन के माध्यम से बना देने के बाद वे परिवेश को छोटी-छोटी गोल-गोल रेखाओ से भरतेहै | जो अन्यंत्र चित्रों में देखने को कम मिलती है |कहीं एक ही रेखा से पूरा चित्र बना देते है बाकी फलक कोरा रहताहै | अनंत सृष्ठि और उसके बीच निपट खडा मनुष्य |बाकी फलक कोरा रहता है |ज्यादातर चित्र मूर्त है | बात करतेहै | आदमी की कहानी आदमी से रेखाओ की चौपाल पर बैठकर सुनाते है |इस चित्रकार में दूर तक आगे जाने कीसम्भावनाये है|

मै रेखांकनों का शास्त्र नहीं जानता |


डॉ. श्रीराम परिहार
अगहन सुदी
संवत २०५३